slider

सप्ताह का कार्टून अवश्य पढ़ें
प्रस्तुति: अभिषेक तिवारी पढने हेतु चित्र पर चटखा लगायें।

This is default featured post 1 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

This is default featured post 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

This is default featured post 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

This is default featured post 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

This is default featured post 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 8 मई 2009

देह [कविता] - विजय कुमार सपत्ति

देह के परिभाषा
को सोचता हूँ ;
मैं झुठला दूं !

साहित्य शिल्पी रचनाकार परिचय:-

विजय कुमार सपत्ति के लिये कविता उनका प्रेम है। विजय अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा हिन्दी को नेट पर स्थापित करने के अभियान में सक्रिय हैं। आप वर्तमान में हैदराबाद में अवस्थित हैं व एक कंपनी में वरिष्ठ महाप्रबंधक के पद पर कार्य कर रहे हैं।


देह की एक गंध ,
मन के ऊपर छायी हुई है !!

मन के ऊपर परत दर परत
जमती जा रही है ;
देह ….
एक देह ,
फिर एक देह ;
और फिर एक और देह !!!

देह की भाषा ने
मन के मौन को कहीं
जीवित ही म्रत्युदंड दे दिया है !

जीवन के इस दौड़ में ;
देह ही अब बचा रहा है
मन कहीं खो सा गया है !
मन की भाषा ;
अब देह की परिभाषा में
अपना परिचय ढूंढ रही है !!

देह की वासना
सर्वोपरि हो चुकी है
और
अपना अधिकार जमा चुकी है
मानव मन पर !!!

देह की अभिलाषा ,
देह की झूठन ,
देह की तड़प ,
देह की उत्तेजना ,
देह की लालसा ,
देह की बातें ,
देह के दिन और देह की ही रातें !

देह अब अभिशप्त हो चुकी है
इस से दुर्गन्ध आ रही है !
ये सिर्फ अब इंसान की देह बनकर रह गयी है :
मेरा परमात्मा , इसे छोड़कर जा चूका है !!

फिर भी घोर आश्चर्य है !!!
मैं जिंदा हूँ !!!

माँ [कविता] - प्राण शर्मा


माँ की निर्मल काया
उससे लिपटी है
सुन्दरता की छाया

युग--युग की क्षमता है
पूजा की जैसी
हर माँ की ममता है

रचनाकार परिचय:-

प्राण शर्मा वरिष्ठ लेखक और प्रसिद्ध शायर हैं और इन दिनों ब्रिटेन में अवस्थित हैं।
आप ग़ज़ल के जाने मानें उस्तादों में गिने जाते हैं। आप के "गज़ल कहता हूँ' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित हैं, साथ ही साथ अंतर्जाल पर भी आप सक्रिय हैं।


धन धान्य बरसता है
माँ के हंसने से
सारा घर हंसता है

मदमस्ती हरसू है
माँ की लोरी में
मुरली सा जादू है

दुनिया में न्यारी माँ
हंसती- हंसाती है
बच्चों की प्यारी माँ

हर बच्चा पलता है
सच है मेरे यारो
घर माँ से चलता है

मन ही मन रोती हैं
बच्चों के दुःख में
माएं कब सोती हैं

हर बात में कच्चा है
माँ के आगे तो
बूढा भी बच्चा है

माँ कैसी होती है
पारस सा मन है
माँ ऐसी होती है

कुछ कद्र करो भाई
बेटे हो फिर भी
क्यों पीड़ित है माई
---------------
"माहिया" पंजाब का प्रसिद्ध लोक गीत है.यूँ तो इसमें श्रृंगार रस रहता है लेकिन अब अन्य रस भी शामिल किये जाने लगे हैं.यह तीन पंक्तियों का छंद है.पहली और तीसरी पंक्तियों में १२ मात्राएँ यानि २२११२२२ और दूसरी पंक्ति में १० मात्राएँ यानी २११२२२ होती हैं .तीनों पंक्तियों में सारे गुरु (२) भी आ सकते हैं
-----

सरोज त्यागी के दोहे व कविता [कविता-पाठ] - स्वर शिल्पी

Photobucket

पिछले दो-तीन सप्ताह से स्वर-शिल्पी पर कविता के स्वरों के रूप में साहित्य शिल्पी द्वारा गाज़ियाबाद में आयोजित कराये गये कवि-सम्मेलन में पढ़ी गई रचनायें सुनवाई जा रही हैं। इसी क्रम को ज़ारी रखते हुये, आज प्रस्तुत है श्रीमती सरोज त्यागी जी की आवाज़ में उनके कुछ दोहे और एक छोटी सी कविता।

तो पहले दोहे:

चुन चुन संसद में गये, हम पर करने राज।
सत्तर प्रतिशत माफ़िया, तीस कबूतरबाज॥

बहन मिली, भैया मिले, मिला सकल परिवार।
लाया मौसम वोट का, रिश्तों की बौछार॥

मँहगाई बढ़ती रही, घटती रही पगार।
चाँदी वही है काटता, जिसकी हो सरकार॥

अल्लाह के संग कौन है, कौन राम के साथ।
बहती गंगा में धुले, इनके उनके हाथ॥

विद्यालय में हो रहा, शिक्षा का आभाव।
घर पर ट्यूशन दे रहे, शिक्षक जी बेभाव॥

अंग-प्रदर्शन यूँ बढ़ा, गये सूट-सलवार।
घाटे में है जा रहा, कपड़ों का व्यापार॥

और कविता के बोल हैं:

आज द्रौपदी नहीं पुकारती है कृष्ण को;
कि नाथ आज लाज हाथ आपके हमारी है।
आज न बेचारी है, न आज दुखियारी है वो
और न लाचारी है, न कल वाली नारी है॥
आज द्रौपदी के तन नाम के हैं वस्त्र देखो
नारी बीच सारी है न सारी बीच नारी है;
आ गये जो कृष्ण चीर कहाँ से बढ़ा सकेंगे
आज की ये द्रौपदी तो सारी ही उघारी है॥

अपनापन [कविता] - श्यामल सुमन

कैसे गीत खुशी के गाऊँ?
सच्चा मीत कहाँ से लाऊँ?
रिश्ता दुनियाँ में जैसे व्यापार हो गया।
बीते कल का ये मानो अखबार हो गया।।

जीने की खातिर दुनियाँ में रिश्तों का दस्तूर।
भाव नहीं दिखता रिश्तों मे जीने को मजबूर।।
फिर भी जीना भला क्यों स्वीकार हो गया।
बीते कल का ये मानो अखबार हो गया।।

अपनापन दिखलाता जो भी क्या अपना होता है
सच्चे अर्थों में अपनापन तो सपना होता है।।
कैसे कहते हैं अपना परिवार हो गया।
बीते कल का ये मानो अखबार हो गया।।

रंगमंच गर है जीवन तो हम अभिनय करते हैं।
दिखलाना हो सुमन को सचमुच बहुत प्रणय करते हैं।
वह पल लगता है अपना संसार हो गया।
बीते कल का ये मानो अखबार हो गया।।