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प्रस्तुति: अभिषेक तिवारी पढने हेतु चित्र पर चटखा लगायें।

शुक्रवार, 8 मई 2009

माँ [कविता] - प्राण शर्मा


माँ की निर्मल काया
उससे लिपटी है
सुन्दरता की छाया


युग--युग की क्षमता है
पूजा की जैसी
हर माँ की ममता है

रचनाकार परिचय:-

प्राण शर्मा वरिष्ठ लेखक और प्रसिद्ध शायर हैं और इन दिनों ब्रिटेन में अवस्थित हैं।
आप ग़ज़ल के जाने मानें उस्तादों में गिने जाते हैं। आप के "गज़ल कहता हूँ' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित हैं, साथ ही साथ अंतर्जाल पर भी आप सक्रिय हैं।


धन धान्य बरसता है
माँ के हंसने से
सारा घर हंसता है

मदमस्ती हरसू है
माँ की लोरी में
मुरली सा जादू है

दुनिया में न्यारी माँ
हंसती- हंसाती है
बच्चों की प्यारी माँ

हर बच्चा पलता है
सच है मेरे यारो
घर माँ से चलता है

मन ही मन रोती हैं
बच्चों के दुःख में
माएं कब सोती हैं

हर बात में कच्चा है
माँ के आगे तो
बूढा भी बच्चा है

माँ कैसी होती है
पारस सा मन है
माँ ऐसी होती है

कुछ कद्र करो भाई
बेटे हो फिर भी
क्यों पीड़ित है माई
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"माहिया" पंजाब का प्रसिद्ध लोक गीत है.यूँ तो इसमें श्रृंगार रस रहता है लेकिन अब अन्य रस भी शामिल किये जाने लगे हैं.यह तीन पंक्तियों का छंद है.पहली और तीसरी पंक्तियों में १२ मात्राएँ यानि २२११२२२ और दूसरी पंक्ति में १० मात्राएँ यानी २११२२२ होती हैं .तीनों पंक्तियों में सारे गुरु (२) भी आ सकते हैं
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1 टिप्पणियाँ:

माँ बस माँहोती हैं

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