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प्रस्तुति: अभिषेक तिवारी पढने हेतु चित्र पर चटखा लगायें।

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शुक्रवार, 8 मई 2009

अपने घर जाओ न अंकल ! [लघुकथा] - सुभाष नीरव

शहर में कर्फ्यू लगा था। लोग अपने-अपने घरों में दुबके बैठे थे। गलियाँ और सड़कें सुनसान पड़ी थीं। तभी, नौ-दस बरस के दो बच्चे न जाने कब अपने घरवालों से आँख बचाकर घर से बाहर निकलकर सड़क पर खेलने लगे। दूर तक खाली पड़ी सुनसान सड़क पर खेलने में उन्हें मजा आ रहा था। रिक्शा, सायकिल, स्कूटर, मोटर कार आदि का कोई भय नहीं था।

तभी, गश्त लगा रहे सिपाही ने उन्हें देखा और डांटते हुए बोला-
''ऐ बच्चो ! भागो यहाँ से... जाओ अपने घरों में...''

रचनाकार परिचय:-

सुभाष नीरव का जन्म 27–12–1953 को मुरादनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। मेरठ विश्वविद्यालय से स्नातक तथा भारत सरकार के पोत परिवहन मंत्रालय में अनुभाग अधिकारी(प्रशासन) के तौर पर कार्यरत सुभाष नीरव की कई कृतियाँ यथा ‘यत्कचित’, ‘रोशनी की लकीर’ (कविता संग्रह); ‘दैत्य तथा अन्य कहानियाँ’, ‘औरत होने का गुनाह’, ‘आखिरी पड़ाव का दु:ख’(कहानी-संग्रह); ‘कथाबिंदु’(लघुकथा–संग्रह), ‘मेहनत की रोटी’(बाल कहानी-संग्रह) आदि प्रकाशित हैं। लगभग 12 पुस्तकों का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद भी वे कर चुके हैं और अनियतकालीन पत्रिका ‘प्रयास’ और मासिक ‘मचान’ का सम्पादन भी कर रहे हैं।
हिन्दी में लघुकथा लेखन के साथ-साथ पंजाबी-हिन्दी लघुकथाओं के श्रेष्ठ अनुवाद के लिए उन्हें ‘माता शरबती देवी स्मृति पुरस्कार, 1992’ तथा "मंच पुरस्कार, 2000" से सम्मानित किया गया जा चुका है।

"साहित्य सृजन" तथा अन्य कई ब्लाग्स के माध्यम से अंतर्जाल पर भी वे सक्रिय हैं।

बच्चे अपना खेल रोक कर खड़े हो गए और सिपाही की ओर फटी आँखों से देखने लगे। हिम्मत कर उनमें से एक बच्चा बोला- ''सड़क तो खाली पड़ी है, हमें खेलने दो न, अंकल ?''

''नहीं, सड़क पर नहीं खेल सकते तुम। तुम्हें मालूम नहीं, शहर में कर्फ्यू लगा है ?''

''वो क्या होता है, अंकल ?'' कमर पर हाथ रखे सहमे-से खड़े दूसरे बच्चे ने पूछा।

''कर्फ्यू में घर से बाहर निकलने वाले को बन्दूक की गोली मार दी जाती है, समझे।''

गोली के नाम पर दोनों बच्चे सहम गए। एकाएक उनमें से एक अपने चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों पर टिकाकर आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए बेहद मासूमियत से बोला, ''तुम भी तो घर से बाहर सड़क पर घूम रहे हो।... तुम्हें भी तो कोई गोली मार सकता है… तुम भी अपने घर जाओ न अंकल !”
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