सरोज त्यागी के दोहे व कविता [कविता-पाठ] - स्वर शिल्पी
पिछले दो-तीन सप्ताह से स्वर-शिल्पी पर कविता के स्वरों के रूप में साहित्य शिल्पी द्वारा गाज़ियाबाद में आयोजित कराये गये कवि-सम्मेलन में पढ़ी गई रचनायें सुनवाई जा रही हैं। इसी क्रम को ज़ारी रखते हुये, आज प्रस्तुत है श्रीमती सरोज त्यागी जी की आवाज़ में उनके कुछ दोहे और एक छोटी सी कविता।
तो पहले दोहे:
चुन चुन संसद में गये, हम पर करने राज।
सत्तर प्रतिशत माफ़िया, तीस कबूतरबाज॥
अपनापन [कविता] - श्यामल सुमन
कैसे गीत खुशी के गाऊँ?
सच्चा मीत कहाँ से लाऊँ?
रिश्ता दुनियाँ में जैसे व्यापार हो गया।
बीते कल का ये मानो अखबार हो गया।।
सच्चा मीत कहाँ से लाऊँ?
रिश्ता दुनियाँ में जैसे व्यापार हो गया।
बीते कल का ये मानो अखबार हो गया।।
अद्भुत है छवि 'यमक' की [काव्य का रचनाशास्त्र] - आचार्य संजीव वर्मा सलिल
अनुप्रास की मिठास का रसपान करने के पश्चात् आइये ठसकदार 'यमक' की रूप-छटा निरखें. 'अनुप्रास' में एक या अनेक वर्णों की एक या अनेक बार आवृत्ति (दोहराव) होता है जबकि 'यमक' में एक या अनेक शब्दों का एकाधिक बार दोहराव होता है वह भी अलग-अलग अर्थों में. 'यमक' का बहुरंगी प्रयोग महाकवि भूषण ने सर्वाधिक किया है.
अपनी हमनफ़स के नाम [नज़्म] - धीरज आमेटा 'धीर'
मिरी जाँ तेरी आँख खुलने से पहले
चला हूँ मैं ये रात ढलने से पहले!
मैं पत्तों से थोड़ी सी शबनम उठा लूँ,
मैं सूरज की पेहली किरण को चुरा लूँ
चला हूँ मैं ये रात ढलने से पहले!
मैं पत्तों से थोड़ी सी शबनम उठा लूँ,
मैं सूरज की पेहली किरण को चुरा लूँ
बीच का रास्ता [लघुकथा] - सूरज प्रकाश
देवदत्त जी का अहमदाबाद तबादला हो गया है। बहुत परेशान हैं बेचारे। कभी अकेले रहे ही नहीं हैं। रहने खाने की तकलीफें हैं सो तो हैं ही, उनका पूरा जीवन अस्तव्यस्त हो गया है। अब हर शनिवार की रात चलकर रविवार सवेरे पहुंचते हैं और उसी रात गाड़ी से लौट जाते हैं। नयी तैनाती का मामला है इसलिये छुट्टी भी नहीं ले सकते। पिछले पांच हफ्ते से यही कर रहे हैं।




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